
खबर सागर
अलगाड़ नदी में मच्छी पकड़ने का राज मौण मेला घूमधाम मनाया
जौनपुर का पौराणीक व ऐतिहासिक सुप्रिद्व
अनेखा राज मौण मेला अगलाड नदी में आयोजित हुआ । जिसमें लोगों ने मच्छी पकड़कर मौण मेला को त्यौहार को हर्ष उल्लास के साथ. मनाया ।
शनिवार को अगलाड़ नदी में प्रति वर्ष आयोजित होने वाला राजशाही मौण मेला मिडें नामें स्थान के बजाय गड़री ताल के समीप निधारित समय 12 बंज कर 45 मिनट पर पात्तीदार ग्रामीण
पट्टी अठजुला के ग्राम काण्डी तल्ला, काण्डी मल्ली, मेलगढ, सड़ब तल्ला, सड़ब मल्ला, बेल, परोगी के ग्रामीणों द्वारा लगभग 26 कट्टे मौण पाऊण्डर परंपरा के अनुसार तिलक लगाकर हर्ष उल्लास के साथ नदी में एक साथ उडेला ।
- नदी में मौण डालते ही मौणथियों में मच्छी
पकड़ने की होड शुरु हुई । जो कि लगभग एक स्थान पर झील बनने से इस बार लगभग 96 साल नियत मौण स्थान को बदलने से लगभग तीन किमी दूरी ही शेष रह गई ।
जैसे जैसे नदी में मौण पाऊण्डर बहता गया वैसे वैसे लोगों नदी में मच्छी पकड़ने के लिए नदी की में चलते रहे ।
इस मौण मेले में दूर दराज क्षेत्र से भारी संख्या में लोग अगलाड़ नदी में शिरकत कर मच्छी पकडकर रात्री को ग्रामीण त्यौहार के रूप में धूमधाम से मनाया जाता है।
ठीक राज मौण मेले के डेढ सप्ताह बाद बद्रीगाड़ नदी में भरवा मौण आयोजित किया जाता है। जिसमें यमुना नदी में अधिक पानी आने के बाद मच्छी बद्रीगाड नदी का रुख करती है। और लोग जनकर इस मौण मेले को भी मनाते है।
मौण मेला समिती के अध्यक्ष महिपाल सिंह सजवाण, जयपाल सिंह राणा, चमन दास आदि का कहना मौण मेला पौराणिक समय से क्षेत्र की जनता आपसी प्रेम व भाई चारें के साथ इस लोक परंपरा को मनाते आ रहे है। हजारों की संख्या में लोग शिरकत कर हर्ष उल्लास के साथ मच्छी पक पकड़ते है ।
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160 साल की परंपरा मौण डालने का स्थान बदला
बता दें कि टिहरी रियासत के टिहरी नरेश भवानी शाह ने सन् 1866 में राजगद्दी संभालने के बाद 1871 तक 22 साल टिहरी रियासत का शासन चलाया ।
इसी दौरान 1866 में जौनपुर की अलगाड़ नदी के नियत स्थान मिडें नामें तोक पर मौण डालने की परपंरा को शुरू किया था ।
लेकिन अगलाड़ में नियत स्थान से पहाड़ी से
मलबा आने से कुछ दूरी पर झील बनने से खतरा को देखते हुए मेला समिती ने गडरी ताल के आगे से नदी में मौण डाला गया है।
जिसमें शासन प्रशासन की घोर लापरवाही आम जनता की सुरक्षा का ध्यान न रखकर झील को खोलने की कोशिश नही कि गई है। जिससे जौनपुर की लोक संस्कृति की आस्था व लगभग 160 की परपंरा को भी तोड़ दिया है। जिससे क्षेत्र की जनता में भारी आक्रोश है।
फोटो – अगलाड़ नदी में मच्छली पकड़ते ग्रामीण ।


