उत्तराखंडपर्यटनमनोरंजनसामाजिक

सावन का आस्था परंपरा से सजी कामर गांव की सूर्यनगरी का अनूठा मेला

खबर सागर

सावन का आस्था परंपरा से सजी कामर गांव की सूर्यनगरी का अनूठा मेला

सावन के पवित्र महीने में उत्तरकाशी के पहाड़ी इलाकों में पारंपरिक मेलों और धार्मिक आयोजनों की धूम शुरू हो गई है। इसी कड़ी में कामर गांव की सूर्यनगरी में आयोजित होने वाली विशेष पूजा और मेले ने अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं के चलते अलग पहचान बनाई है।
कमरगांव में होने वाले इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां नशामुक्त वातावरण में पूजा और मेले का आयोजन किया जाता है। गांव में शराब और अन्य नशीले पदार्थों के सेवन पर पूरी तरह रोक रहती है। पूजा स्थल और गांव के भीतर नशे का सेवन करने वालों के प्रवेश को भी वर्जित रखा जाता है। ग्रामीणों की यह पहल धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक जागरूकता का भी संदेश देती है।
मेले के दौरान आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक वेशभूषा और श्रद्धा के साथ पहुंचते हैं। ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद रात में पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दौर चलता है, जिसमें महिलाएं और पुरुष एक-दूसरे का हाथ थामकर सामूहिक रूप से लोकनृत्य करते हैं। लंबे समय बाद अपने गांव और परिवार में लौटे लोगों के चेहरों पर इस दौरान खास खुशी देखने को मिलती है।
इस धार्मिक आयोजन में आसपास के गांवों से बड़ी मात्रा में दूध एकत्र किया जाता है। बताया जाता है कि डेढ़ क्विंटल से अधिक दूध एकत्र कर शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता है। इसके बाद गंगाजल से अभिषेक कर उसी दूध से खीर तैयार की जाती है। पूजा-अर्चना के बाद खीर को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है और लोग प्रसाद ग्रहण कर सुख-समृद्धि की कामना के साथ अपने घर लौटते हैं।
बाबा बेणेश्वर की आस्था से जुड़ी है परंपरा
स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह आयोजन बाबा बेणेश्वर की आस्था से जुड़ा हुआ है। बेणेश्वर धाम का धार्मिक महत्व क्षेत्र में विशेष माना जाता है और कई गांवों में बाबा बेणेश्वर के मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। हर वर्ष सावन में निर्धारित तिथि पर आयोजित होने वाला यह मेला स्थानीय लोगों के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।
मेले में उत्तरकाशी के साथ-साथ दूरदराज के गांवों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। कई लोग अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना लेकर यहां आते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई प्रार्थना बाबा के दरबार में अवश्य स्वीकार होती है।
मेले में मिलती है बिछड़े अपनों से मिलने की खुशी
यह मेला केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक बन चुका है। रोजगार और अन्य कारणों से बाहर रहने वाले ग्रामीण जब वर्षों या कई महीनों बाद मेले के अवसर पर अपने गांव लौटते हैं तो परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलकर उनके चेहरों पर अलग ही खुशी दिखाई देती है।
सावन की हरियाली, ढोल-नगाड़ों की गूंज, लोकनृत्य, पूजा-अर्चना और श्रद्धालुओं की आस्था मिलकर कमरगांव के इस आयोजन को उत्तरकाशी की लोक संस्कृति की एक विशिष्ट पहचान प्रदान करते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!