खबर सागर
भगवान श्री कृष्ण का जन्म का प्रसंग बहुत भावव मन मोहक रहा
पृथ्वी पर असुरों का भार बढ़ गया था। पृथ्वी माता गाय का रूप धरकर ब्रह्मा जी के पास गईं। देवताओं के साथ क्षीरसागर में भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान ने कहा – _”मैं यदुवंश में, वसुदेव-देवकी के पुत्र रूप में अवतार लूंगा और दुष्टों का संहार कर धर्म की स्थापना करूंगा। योगमाया को आदेश दिया कि वो पहले नंद बाबा के घर योगमाया रूप में जन्म लें।
श्रावण मास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र, आधी रात। वसुदेव कारागार में बंद थे। कंस के डर से पहरा था। ठीक 12 बजे सारे द्वार अपने आप खुल गए, पहरेदार सो गए। कारागार में 16 कलाओं से युक्त, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। देवकी ने स्तुति की।
भगवान ने कहा – _”पिता मुझे टोकरी में रखकर गोकुल नंद बाबा के घर छोड़ आओ” वसुदेव जी ने नवजात कृष्ण को टोकरी में रखा। यमुना जी रास्ता देने के लिए दो भाग हो गईं। शेषनाग ने फन फैलाकर वर्षा से बचाया। नंद बाबा के घर पहुंचकर वसुदेव जी ने कृष्ण को यशोदा मैया के पास सुला दिया और योगमाया कन्या को ले आए।
कंस ने जैसे ही कन्या को मारने के लिए पटका, वो हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और बोली – _”कंस! तुझे मारने वाला गोकुल में जन्म ले चुका है,कंस डर गया और ब्रज के सारे नवजात बच्चों को मारने का आदेश दे दिया।
इस मौके पर वृद्वावन से संत बालक दास, आचार्य कपिल सेमवाल, रोहित मिश्रा, दीपक नौटियाल, नितिन बिरेंद्र गौड़,मोहन लाल नौटियाल, बिरेन्द्र दत्त, शरण सिंह पंवार, बचन सिंह रावत, नागेन्द्र पुण्डीर,सीमा देवी, मीरा देवी, बीनों देवी,जया देवी, पप्पा देवी, गजीरा देवी, नवीन रावत, अरविद कंडारी आदि उपस्थित थे।



