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जलवायु परिवर्तन का असर: समय से पहले फूलने लगे बुरांस के फूल

खबर सागर

जलवायु परिवर्तन का असर: समय से पहले फूलने लगे बुरांस के फूल

मोहन थपलियाल, नैनबाग –

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का असर साफ दिखने लगा है। आमतौर पर मार्च-अप्रैल में खिलने वाले बुरांस के फूल इस बार जनवरी – फरवरी में ही खिलने से पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय है । साथ ही स्थानीय लोगों के लिए भी खतरे की घंटी है।

बुरांस के फूलों का समय से पहले खिलना जलवायु परिवर्तन का एक स्पष्ट संकेत है। जहां जौनपुर के पर्यटन नगरी धनोल्टी, नागाटिव्बा आदि जंगलों में जहां भारी मात्रा में बुरांस के फूलों जंगल लद -कद रहते थे। लेकिन इस बार समय से पहले खिलने के साथ बहुत कम पेड़ों में फूल आए है।
जब कि वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में पाया है कि बुरांस के डीएनए को जनवरी में ही मार्च जैसी गर्मी के संकेत मिल रहे हैं । जिससे फूल बनने की प्रक्रिया समय से पहले शुरू हो जाती है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव-

स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव- बुरांस के फूल स्थानीय लोगों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। जहा विगत कई वर्षो से बुरांस के जूस पहाडों के लिए आजिविका का एक स्वरोजार एक जरिया है। लेकिन जलवायु परिवर्तन से यह प्रभावित हो सकता है।
समय से पहले फूल खिलने से परागण की प्राकृतिक प्रक्रिया प्रभावित होती है, जिससे बीजों की गुणवत्ता और अंकुरण प्रभावित होता है।

जैव विविधता का नुकसान –
— जलवायु परिवर्तन से बुरांस के साथ-साथ अन्य जड़ी-बूटियों की प्रजातियों पर भी खतरा है। साथ ही हर साल समय अनुकूल बारिश न होना । पारंपरिक फसलों का उत्पादन में गिरावट आना ।
— मुख्य सबसे बड़ी बात है कि खेतों में तैयार होने से फसलों में कई प्रकार के कीटनाशक लगने फसल को भारी नुकशान होने कास्तकारों के लिए ज्यादा चिंता का विषय बनता जा रहा है। जिससे कास्तकारों का खेती-बाड़ी से मुंह भंग होता जा रहा है ।

हम सब क्या कर सकते –

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए हमें अपने दैनिक जीवन में कुछ बदलाव करने होंगे। हम ऊर्जा की बचत कर, विभिन प्रजातियों पौधों का वृक्षारोपण कर जलवायु परिवर्तन में सहायक बननें के साथ जागरूकता फैला सकते है।
जिसमें – हर साल वनों को आग लगने से जड़ी बूटी, जीव जन्तु व अनेक प्रकार की वनस्पति जलकर राख होने से जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा प्रभाव मुख्य तौर पर पहाड़ों में देखने को मिल रहा है । जिसमें पर्यावरण के प्रति हम सबकों जागरुक होने की जरूरत है।

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