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वैशाखी पर्व पर थौलाधार क्षेत्र के काण्डीसौड में मेलें का शुभारंभ

खबर सागर                                                                                                                                          देव भूमि की संस्कृति में ऐतिहासिक बैशाखी (बिखोत) मेले के कण्डीसौड़ में आगाज होने के साथ क्षेत्र में पूरे वैशाख माह प्रतिवर्ष धूमधाम जगह मेलों की शुरुआत हो गई।

आज से बैशाखी पर्व पर जनपद के कण्डीसौड़ में पौराणिक परम्परानुसार स्वत: स्फूर्त मेले का आयोजन होते है।
शादियों के सीजन के कारण मेले में भीड़ कुछ कम जुटी।
क्षेत्र में वैशाख माह में विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग तिथियों को मेले आयोजित होने की ऐतिहासिक परंपराएं हैं।

इन्हीं मेलों के शुभारंभ के रूप में वैशाख संक्रांति को रियासत काल से ही भागीरथी तट पर छाम के पास तरासौड़ में मेले का आयोजन होता था।
जो कि सन् 2005 में टिहरी बाँध झील भराव के साथ जलमग्न हो चुका है।
तरासौड़ में पौराणिक काल से बैशाखी मेला कब से प्रारम्भ हुआ इसकी कोई जानकारी नहीं है।क्षेत्र के बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि उनके बुजुर्ग भी बताते थे कि विखोत मेला भागीरथी किनारे छाम के तरासौड़ में निरन्तर स्वतः स्फूर्त आयोजित होते देखा है।

तब मेले का स्वरूप कुछ अलग होता था।गांव से पापडी़ व स्वांला (आलू गहथ् की भरी पूरी)टोकरी में भर कर ले जाते थे।दूर दराज से बहु बेटियां मेले में आती थी एक दूसरे को कलेऊ बांटती थी।दुकाने अधिकांश अंदरखी(चौकोर बढिया गुड़),भूने चना,पकोडी़, जलेबी की लगती थी।
भागीरथी के शुद्ध ठंढे़ जल में खाना पीना होता था।
थौलधार के पट्टी गुसाईं,नगुण व जुवा के अतिरिक्त भागीरथी पार के उत्तरकाशी जनपद की दिचली, गमरी पट्टीयों के हजारों लोग मेले में जुटते थे।समय के साथ मेले में जुटने वाले क्षेत्रों का विस्तार हुआ।

बड़े-बुजुर्ग दुःखी मन से कहते हैं कि टिहरी डामन् पुराणी परम्परा पर ही डाम(गढ़वाली में डाम दागने को कहते हैं)लगैयाली। छाम- बल्डोगी पुल के टिहरी बांध झील में डूबने के बाद अभी तक पुनर्निर्माण नहीं होने से झील पार के लोग मेले में नहीं आ पाते हैं।

बता दें कि क्षेत्र के लोगों एवं ब्यापार मण्डल कण्डीसौड़(छाम) द्वारा व्यक्तिगत प्रयासों से वर्ष 2008 से छाम बिखोत मेले का कंडीसौड़ में आयोजन किया जा रहा है।

बिखोत त्योहार के साथ ही लोग मेले का भी आनन्द उठाते हैं। बच्चे झूले चरखी आदि का आनंद उठाते हैं तो महिलाएं अपने जरूरत के सामानों की खरीदारी करती हैं।
किन्तु बिना सरकारी सहायता के पुराना स्वरूप लौटना संभव नहीं है।
समाजिक कार्यकर्ता ललित खण्डूडी़,सुमन सिंह गुसाईं, ग्राम प्रधान श्रीमती नीलम कुमाईं,क्षेत्र पंचायत सदस्य धनबीर पुरषोड़ा,मुकेश रतूड़ी, शैला गुसाईं आदि का कहना है कि क्षेत्र के सांस्कृतिक संरक्षण के लिए ऐतिहासिक छाम बिखोत मेले की भब्यता के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास होना चाहिए।

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