
खबर सागर
बनाल पट्टी में मनाया जाने वाला देवलांग पर्व में धूमधाम से मनाया गया
उत्तरकाशी के बडकोट के तहत देवलांग रंवाई घाटी में मनाया जाने वाला एक ऐतिहासिक और पौराणिक मेला है, जो दीपावली के एक महीने बाद अमावस्या की रात को आयोजित होता है। यह मेला मुख्य रूप से बनाल पट्टी के गैर गाँव, ठकराल पट्टी के गंगटाड़ी और बजरी पट्टी के कुथनौर में मनाया जाता है।
देवलांग मेले का मुख्य आकर्षण दुनिया की सबसे लंबी मशाल मानी जाने वाली विशाल देवलांग को तैयार करके जलाना है।
बता दें कि मेला गढ़वाली सेना की तिब्बत विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, जो 1627-28 में हुई थी जब सेनापति माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाली सेना ने तिब्बतियों को हराया था।
तब से स्थानीय लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है।
मान्यताएं है कि बड़कोट क्षेत्र से जुड़े गैर बनाल क्षेत्र में धूमधाम से मनाया गया, राजकीय पर्व देवलांग, गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी गैर बनाल क्षेत्र में पौराणिक पर्व देवालांग मेले की धूम रही, बुडी दीवाली पर लगने वाले इस मेले का आयोजन पौराणिक रूप मे होता आ रहा है।
यहां पर पूरी रात भर ढोल नगाड़ों की थाप पर रासो, तांदी नृत्य के साथ धूमधाम यह पर्व बडे़ उल्लास से मनाया जाता है ,जिसमें पूरे रवाईं के क्षेत्र के लोग दूर-दूर से इस मेले को देखने बनाल क्षेत्र के रघुनाथ मंदिर के प्रांगण में पहुंचते है।
मेले का मुख्य आकर्षण एक विशाल देवदार के वृक्ष (देवलांग) को तैयार करना है, जिसे हजारों लोग मिलकर बनाते हैं और जलाते हैं।
सांस्कृतिक प्रदर्शन: इस अवसर पर ढोल-नगाड़ों के साथ तांदी और झुमेला जैसे पारंपरिक नृत्य किए जाते हैं, और राजा रघुनाथ की गाथाओं का गायन की परंपरा आज भी कायम है।



